न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता !
बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल* है दुनिया मेरे आगे,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता !
बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल* है दुनिया मेरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़* तमाशा, मेरे आगे !
(*बच्चों का खेल, *रात और दिन)
हर एक बात पे कहते हो तुम,कि तू क्या है ,
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ्तगू क्या है;
रागों में दौडते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है ;
बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता ,
वगरना शहर में “ग़ालिब” की आबरू क्या है !
हर एक बात पे कहते हो तुम,कि तू क्या है ,
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ्तगू क्या है;
रागों में दौडते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है ;
बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता ,
वगरना शहर में “ग़ालिब” की आबरू क्या है !
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